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अकबर की राजपूत नीति एवं राजस्थान में मुगल प्रभुत्व की स्थापना: नीति, युद्ध और विस्तार

 

अकबर की राजपूत नीति एवं राजस्थान में मुगल प्रभुत्व की स्थापना: नीति, युद्ध और विस्तार


अकबर ने राजस्थान में मुगल सत्ता की स्थापना सैन्य शक्ति के साथ-साथ कूटनीति, विवाह सम्बन्धों और सहिष्णु नीति के माध्यम से की। 1580 ई. तक लगभग सम्पूर्ण राजस्थान पर मुगल प्रभुत्व स्थापित हो गया। प्रशासनिक दृष्टि से राजस्थान को ‘अजमेर सूबा’ के अंतर्गत संगठित किया गया। अकबर की नीति “लोहे से लोहा काटना” और “सुलह-ए-कुल” पर आधारित थी, जिससे उसने राजपूतों को साम्राज्य का अभिन्न अंग बनाया और राजस्थान में स्थायी मुगल शासन की नींव रखी।

अकबर ने सर्वप्रथम 1562 ई. में आमेर के राजा भारमल की पुत्री से विवाह किया, जिससे कच्छवाहा राजपरिवार के साथ उसका निकट का सम्बन्ध स्थापित हो गया। कालान्तर में जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर आदि राजघरानों तथा उनके भाई-बेटों की पुत्रियाँ मुगल हरम में पहुँचीं, जहाँ उन्हें अपना धर्म-परिवर्तन करने के लिए बाध्य नहीं किया गया। सम्बन्धित व अधीनस्थ राजपरिवारों के सदस्यों को मुगल प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान दिए गए। उन्हें उच्च मनसब तथा सम्मानसूचक पदवियों व उपाधियों से विभूषित किया गया। राजपूतों को उनकी सैनिक सेवाओं के बदले में अतिरिक्त जागीरें भी दी गईं। इन राजपूत शासकों ने मुगल साम्राज्य के विस्तार में प्रशंसनीय सहयोग दिया। अकबर की इस नीति के फलस्वरूप ही राजस्थान में मुगल शासन की स्थापना में राजपूत नरेशों का भी पूर्ण व अमूल्य सहयोग प्राप्त हो सका। मेवाड़ और जैसलमेर पर मुगल सेना नायक के अधिकार किया। स्वयं अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर 1568 ई. में इस ऐतिहासिक किले को हस्तगत किया। 1569 ई. में मुगल हाड़ा के पतन होने पर रणथम्भौर के गढ़ पर मुगल प्रभुत्व स्थापित हो गया। इस समय सैनिक अभियानों में राजपूतों का सक्रिय सहयोग रहा। 

मारवाड़ का राव चन्द्रसेन 1570 ई. में नागौर में अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ था। परन्तु उसे शाही दरबार स्वीकार नहीं लगा। उसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और वह जीवनपर्यन्त शाही फौज से अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करता रहा। चन्द्रसेन के विरुद्ध लड़े गए युद्धों में भी राजपूत शासकों ने शाही फौजों को यथासम्भव सहायता पहुँचाई। अकबर ने बीकानेर के कुंवर रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया था। सिरोही में देवराज सूतारण की समस्या को सुलझाने के लिए भी रायसिंह को भेजा गया था। 

सफल सैनिक अभियान के बाद गुजरात से लौटती शाही फौज को, जिसका नेतृत्व कुंवर मानसिंह कच्छवाहा कर रहा था, अकबर ने आदेश दिया था कि रास्ते में बागड़ प्रदेश के स्थानीय शासकों को भी मुगल आधिपत्य स्वीकार कराते। परिणामतः मानसिंह ने डूंगरपुर व बांसवाड़ा क्षेत्रों पर अकबर का प्रभुत्व स्थापित कर दिया। मेवाड़ के राणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार कराने के अनेक प्रयास किये परन्तु स्वतंत्रता-प्रेमी राणा ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। राणा के विरुद्ध मानसिंह के सेनापतित्व में शाही फौज भेजी गई जिसमें अन्य राजवंश के राजपूत सैनिक भी सम्मिलित थे। 21 जून, 1576 को हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया। यद्यपि इस युद्ध से राणा की सैनिक शक्ति को क्षति पहुँची थी, फिर भी राणा के मनोबल व साहस में किसी प्रकार की कमी नहीं आई। वह अपने सहयोगियों के साथ छप्पन के पहाड़ों में जा रहा और जीवनपर्यन्त शाही सेनाओं से लोहा लेता रहा। अपने जीवन की समाप्ति से पहले वह मेवाड़ के अधिकांश भाग पर पुनः अपना अधिकार स्थापित करने में भी सफल रहा। मेवाड़ के विरुद्ध सैनिक अभियानों में राजपूत राजाओं ने यथासम्भव मुगल सम्राट की सहायता की थी। इस प्रकार अकबर ने लोहे से लोहा काटने की नीति का सफलतापूर्वक संचालन किया। फलस्वरूप 1580 ई. तक लगभग सम्पूर्ण राजस्थान पर मुगल-प्रभुत्व की स्थापना हो चुकी थी।

सन 1580 ई. में मुगल साम्राज्य बारह सूबों में विभाजित था। साम्राज्य के प्रशासनिक मानचित्र में राजस्थान जैसा कोई प्रान्त नहीं था, और न कोई राजनीतिक इकाई ही इस प्रकार की थी

अतः राजस्थान का विस्तृत भूखण्ड अपनी राजधानी के नाम पर ‘अजमेर का सूबा’ कहलाया। अकबर ने तब अनजाने एकीकृत राजस्थान का प्रथम बार बीजारोपण किया जो अनेक शताब्दियों के पश्चात् फलित हो सका। अन्य सूबों की भाँति अजमेर सूबा भी सरकारों और परगनों अथवा महलों में विभाजित किया गया था। अजमेर के अन्तर्गत छह सरकारें- अजमेर, चित्तौड़, रणथम्भौर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर और सिरोही थीं। उस समय परगनों की संख्या 197 थी। यह स्थिति 18वीं शताब्दी के आरम्भ में फर्रुखसियर के शासन काल में छोटे-से परिवर्तन के साथ बनी रही। शासकीय सुविधाओं का प्रबन्ध करने के अन्तर्गत बीकानेर सरकार को जैसलमेर के निकट एक पृथक सरकार का गठन किया गया था। तब से अजमेर सूबे में आठ सरकारें हो गईं। उस समय परगनों की संख्या 123 रह गई थी। राजस्थान के अधीनस्थ सभी रजवाड़े अजमेर सूबे में सम्मिलित किये गये थे। इस सूबे की विशेषता यह थी कि वहाँ अधिकारी केवल राजस्व के ही जमकर थे। शासन सम्बन्धी केवल दो सरकारें- अजमेर और नागौर-परगना रूप से शाही प्रशासन के अधीन थीं। कट्टराज्यों का शासन वहाँ के वंशानुगत राजाओं द्वारा संचालित था। मुगल दरबारों का राजकीय पक्ष इन रजवाड़ों-जागीरदार शब्द से सम्बोधित किया जाता था, परन्तु वास्तविकता में इन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। मुगल साम्राज्य में इन शासकों को पद, मर्यादा आदि से युक्त किया गया। कुछ विशिष्ट धारावाहिक कर के रूप में शाही खजाने में जमा कराते थे और निश्चित संख्या में सैनिक व घुड़सवार राजकीय सेवा में प्रस्तुत करते थे। वे प्रशासनिक बदलावों का कार्य राज्य स्तर पर अपने कर्मचारियों द्वारा करते थे। वहाँ के निम्नाधिकारियों को अपने घराने की मान्यता की पूर्ण स्वतंत्रता थी। इन कर राज्यों की सीमा में किसी विदेशी को पग-पग पर कर चुकाना पड़ता था। सम्राट इन कट्टराज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था। यहाँ के शासक दण्ड-दान जैसे विषयों में स्वतंत्र रूप से कार्य करते थे। 

अजमेर के सूबेदार का सामान्य रूप से सम्पूर्ण सूबे पर नियन्त्रण रहता था। परन्तु वह इन कट्टराज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था। कुछ महत्वपूर्ण स्थानों जैसे दौसा (बिराड़गढ़), सांभर, ब्यावर आदि पर शाही फौजदार नियुक्त थे। रणथम्भौर किले पर शाही फौज का जमाव रहता था। इन्हीं की सहायता से अजमेर का सूबेदार सूबे में शान्ति बनाये रखने का कार्य करता था। 

सिक्के ढलवाना फर्रुखसियर शक्ति का प्रतीक माना जाता था। कट्टराज्यों के शासकों को सिक्के ढलवाने का अधिकार नहीं था। अकबर ने 42 टकसालों (टकसाल) का उल्लेख किया है। वे सभी राजकीय टकसालें थीं। मुगल सम्राट शाही सिक्के का प्रचलन करता था। अन्तर्राज्यीय मामलों में फर्रुखसियर सत्ता का पूर्ण रूप से नियन्त्रण रहता था। अन्तर्राज्यीय मामलों में शाही मान्यता प्राप्त करनी पड़ती थी। सिंहासनारोहण के समय यह मुगल सम्राट को कर के रूप में भेंट करना पड़ता था तथा खराज आदि भी देने पड़ते थे। सम्राट की ओर से उसे खिलअत व अन्य सम्मान प्रदान किया जाता था। अकबर ने अपने अनुकूल प्रभाव वाले राजपूतों को सुदृढ़ किया जिससे वे सदैव उसके विश्वसनीय और स्वामिभक्त बने रहे।

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