भारत में लोकपाल एवं लोकायुक्त : भ्रष्टाचार निवारण में भूमिका एवं प्रभावशीलता का विश्लेषण
"भारत में लोकपाल एवं लोकायुक्त : भ्रष्टाचार निवारण में भूमिका एवं प्रभावशीलता का विश्लेषण
शिकायत निवारण संस्थाएँ (Grievance Redressal Institutions)
ओम्बुड्समैन
नागरिकों की शिकायतों के निवारण के लिए दुनिया की सबसे पहली जनतांत्रिक संस्था “स्कैन्डिनेवियन इंस्टीट्यूशन ऑफ ओम्बुड्समैन” थी।इस संस्था का निर्माण सर्वप्रथम स्वीडन में 1809 ई. में हुआ था।
‘ओम्बुड्समैन’ स्वीडिश शब्द है, जिसका अर्थ है – किसी अन्य व्यक्ति का प्रतिनिधि।
ओम्बुड्समैन नागरिकों की निम्नलिखित शिकायतों का निवारण करता है—
कुप्रशासन
प्रशासनिक भ्रष्टाचार
भाई-भतीजावाद
अनियमितता
प्रशासनिक विवेकाधिकार का दुरुपयोग
स्वीडन में ओम्बुड्समैन की नियुक्ति संसद द्वारा चार वर्ष के लिए की जाती है।
उसे केवल संसद द्वारा ही हटाया जा सकता है।
वह अपनी वार्षिक रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करता है, इसलिए उसे “संसदीय ओम्बुड्समैन” भी कहा जाता है।
वह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से स्वतंत्र होता है।
यह एक संवैधानिक पद है।
वह सभी सरकारी अधिकारियों, नागरिक, न्यायिक तथा सैनिक अधिकारियों पर निगरानी रखता है ताकि वे कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्य करें।
उसे किसी निर्णय को बदलने या रद्द करने का अधिकार नहीं होता।
विशेषताएँ
प्रशासन अथवा न्यायालयों पर उसका कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता।
वह अपनी कार्यवाही नागरिकों की शिकायतों या स्वयं की पहल पर कर सकता है।
वह किसी भी भ्रष्ट अधिकारी पर कार्यवाही हेतु मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचाता है, लेकिन स्वयं दंड नहीं देता।
ओम्बुड्समैन की व्यवस्था स्कैंडिनेविया से अन्य देशों में फैली—
फिनलैंड (1919)
डेनमार्क (1955)
नॉर्वे (1962)
न्यूजीलैंड में संसदीय जांच आयुक्त 1962 में स्थापित किया गया।
ग्रेट ब्रिटेन में संसदीय प्रशासन आयुक्त 1967 में स्थापित हुआ।
भारत में ओम्बुड्समैन को “लोकपाल” या “लोकायुक्त” कहा जाता है।
डोनाल्ड सी. रोवाट के अनुसार—
“यह नौकरशाही के आतंक के विरुद्ध लोकतांत्रिक सरकार की ढाल है।”
गेराल्ड ई. कैडेन ने इसे “संगठित जनतंत्र” कहा है।
फ्रांस में प्रशासनिक न्यायालय नागरिकों की शिकायतों का निपटारा करते हैं, जबकि चीन आदि देशों में भी ऐसी प्रणालियाँ पाई जाती हैं।
लोकपाल
प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) 1966 ने नागरिकों की शिकायतों के निवारण के लिए “लोकपाल” और “लोकायुक्त” नामक संस्थाओं की स्थापना की सिफारिश की।
इन संस्थाओं का गठन “स्कैन्डिनेवियन” देशों की ओम्बुड्समैन संस्था और न्यूजीलैंड के संसदीय जांच आयुक्त के नमूने पर किया गया था।
लोकपाल का कार्य केंद्र तथा राज्यों के स्तर पर मंत्रियों और सचिवों के विरुद्ध शिकायतों का निपटारा करना है।
लोकायुक्त (एक केंद्र में तथा प्रत्येक राज्य में) का कार्य विशेष उच्च अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों का निपटारा करना है।
प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने न्यूजीलैंड की तरह न्यायपालिका को लोकपाल और लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा, जबकि स्वीडन में ओम्बुड्समैन के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका भी आती है।
(ARC) रिपोर्ट के अनुसार, लोकपाल की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति की सलाह से राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए।
(ARC) ने यह भी सिफारिश की कि लोकपाल और लोकायुक्त संस्थाओं में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए—
वे स्पष्ट रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष हों।
जांच और कार्यवाही गुप्त होनी चाहिए।
जांच और कार्यवाही अनौपचारिक प्रकृति की होनी चाहिए।
नियुक्ति जहाँ तक संभव हो, गैर-राजनीतिक होनी चाहिए।
उनकी प्रतिष्ठा देश के सर्वोच्च न्यायिक पदाधिकारियों के समान होनी चाहिए।
उनकी कार्यवाहियाँ न्यायिक हस्तक्षेप के अधीन नहीं होनी चाहिए।
वे अपने विवेक से उन मामलों को लें जिनका संबंध अन्याय, भ्रष्टाचार या पक्षपात से हो।
अपने कार्यों से संबंधित आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए उन्हें पर्याप्त अधिकार मिलें।
कार्यकारी सरकार से उन्हें किसी प्रकार के हित या आर्थिक लाभ की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
अभी तक कई सरकारी प्रयास किए गए हैं, परंतु किसी न किसी कारण से विधेयक पारित नहीं हो सका।
वर्ष 2011 में भी लोकपाल विधेयक पारित करने का प्रयास किया गया, लेकिन राज्य सभा में यह पारित नहीं हो सका।
लोकपाल विधेयक को संसद की मंजूरी मिल चुकी है, जिसके दायरे में प्रधानमंत्री को भी रखा गया है।
लोकायुक्त
लोकायुक्त संस्था की सबसे पहले स्थापना 1971 में महाराष्ट्र में की गई थी। हालांकि उससे संबंधित विधेयक उड़ीसा में 1970 में पारित हो गया था और वहाँ अधिनियम 1983 में लागू हुआ।राज्यों में लोकायुक्त
उड़ीसा – 1970
महाराष्ट्र – 1971
राजस्थान – 1973
बिहार – 1974
उत्तर प्रदेश – 1975
मध्य प्रदेश – 1981
लोकायुक्त की संरचना सभी राज्यों में एक समान नहीं होती।
लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, जिसके लिए अलग-अलग राज्यों में अलग नियम हैं।
योग्यताएँ निश्चित नहीं हैं।
अधिकांश राज्यों में लोकायुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो पहले हो) तक होता है, और वह पुनः नियुक्त नहीं हो सकता।
राज्यों में लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग होते हैं।
अधिकांश राज्यों में लोकायुक्त प्रशासन के अनुचित कार्यों के विरुद्ध नागरिकों से प्राप्त शिकायतों या स्वयं की पहल पर जांच कर सकता है।
लेकिन उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और असम में उसे स्वतः जांच शुरू करने का अधिकार नहीं है।
लोकायुक्त शिकायतों तथा आरोपों दोनों प्रकार के मामलों पर विचार कर सकता है।
यह राज्य विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होता है।
यह राज्य की जांच एजेंसियों की सहायता लेता है।
यह राज्य सरकार के विभागों से संबंधित फाइलें और दस्तावेज़ तलब कर सकता है।
लोकपाल
44 साल तक लोकपाल की मांग उठने के बाद अंततः केंद्र स्तर पर लोकपाल बिल पास हो गया।
इसके लिए पहले अन्ना हजारे के आंदोलन और जन दबाव के कारण सरकार ने लंबे समय से लंबित इस मुद्दे पर ध्यान दिया।
लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक को लोकसभा में 27 दिसंबर, 2011 को पारित किया गया।
राज्यसभा में कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बनने के कारण विधेयक को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा गया।
समिति ने 31 जनवरी, 2013 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कई सुधार सुझाए गए।
बाद में संशोधित विधेयक को राज्यसभा में पास किया गया।
संशोधनों के बाद यह मूल विधेयक से कई मामलों में भिन्न हो गया।
संसद से पारित विधेयक अन्ना हजारे के जन आंदोलन की सभी मांगों के अनुरूप नहीं था।
तीन प्रमुख प्रस्ताव इसमें शामिल नहीं किए गए।
इस विधेयक में न तो सिटिजन चार्टर को शामिल किया गया और न ही राज्यों में लोकायुक्त की अनिवार्यता का प्रावधान किया गया।
सीबीआई को लोकपाल के अधीन रखने या उसकी स्वतंत्र जांच एजेंसी बनाने का प्रावधान भी नहीं किया गया।
लोकपाल में नवीन संशोधन (सिफारिशें)
राज्यों में लोकायुक्त के गठन का प्रावधान हटाया जाए।
नई धारा-63 जोड़ी गई, जिसके तहत इस कानून के लागू होने के 365 दिनों के भीतर राज्य विधानसभाओं को लोकायुक्त संस्था का गठन करना होगा।
अन्य महत्वपूर्ण सिफारिशें
लोकपाल का चयन उसी प्रकार होना चाहिए जैसे अन्य उच्च पदों का चयन होता है।
चयन समिति के पांच सदस्य (प्रधानमंत्री सहित) पहले चार सदस्यों की सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जा सकते हैं।
लोकपाल के दायरे से दान लेने वाली संस्थाओं और संगठनों को बाहर रखा जाए, केवल वे संस्थाएं या अधिकारी शामिल हों जो सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत हों।
लोकपाल को प्रथम दृष्टि में मामला बनता दिखने पर प्रारंभिक जांच के बाद सीधे जांच का आदेश देने का अधिकार होना चाहिए।
प्रारंभिक जांच के दौरान लोक सेवक से टिप्पणी मांगना अनिवार्य नहीं होना चाहिए।
लोक सेवकों के अभियोजन की मंजूरी का अधिकार सरकार के स्थान पर लोकपाल को दिया जा सकता है।
निर्णय लेने से पहले लोकपाल संबंधित लोक सेवक से टिप्पणी मांग सकता है।
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को मजबूत बनाने के लिए कई संशोधन सुझाए गए।
लोकपाल एवं लोकायुक्त – संरचना
लोकपाल का एक अध्यक्ष होगा, जो या तो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति हो सकता है।
लोकपाल में अधिकतम 8 सदस्य हो सकते हैं, जिनमें से आधे सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि के होने चाहिए।
इसके अलावा कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यक और महिलाओं में से होने चाहिए।
कौन नहीं हो सकता?
संसद सदस्य या किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की विधान सभा का सदस्य।
ऐसा व्यक्ति, जिसे किसी प्रकार के नैतिक भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया हो।
ऐसा व्यक्ति, जिसकी आयु अध्यक्ष या सदस्य बनने तक 45 वर्ष से कम हो।
किसी पंचायत या निगम का सदस्य।
ऐसा व्यक्ति, जिसे राज्य या केंद्र सरकार की नौकरी से बर्खास्त या हटाया गया हो।
चयन समिति
प्रधानमंत्री – अध्यक्ष
लोकसभा अध्यक्ष – सदस्य
लोकसभा में विपक्ष के नेता – सदस्य
मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश – सदस्य
राष्ट्रपति द्वारा नामित कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति – सदस्य
अध्यक्ष या किसी सदस्य की नियुक्ति इसलिए अवैध नहीं होगी कि चयन समिति में कोई पद रिक्त था।
पद मुक्त के बाद
लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्य पद छोड़ने के बाद किसी भी लाभ के पद पर नियुक्त नहीं हो सकते।
वे अध्यक्ष या सदस्य के रूप में पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होते।
उन्हें कोई कूटनीतिक या प्रशासनिक पद (जैसे राज्यपाल आदि) नहीं दिया जा सकता।
कोई अन्य ऐसा पद भी नहीं दिया जा सकता, जिसके लिए राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर से नियुक्ति आवश्यक हो।
पद छोड़ने के बाद 5 वर्षों तक वे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद, राज्य विधान सभा या स्थानीय निकायों के चुनाव नहीं लड़ सकते।
जांच शाखा
यदि कोई जांच समिति मौजूद नहीं है, तो भ्रष्टाचार के आरोपों की प्रारंभिक जांच के लिए लोकपाल एक जांच शाखा का गठन कर सकता है, जिसका नेतृत्व एक निदेशक करेगा।
इस जांच शाखा के लिए केंद्र सरकार अपने मंत्रालयों/विभागों से आवश्यक अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी।
अभियोजन शाखा
किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध लोकपाल की शिकायतों की पैरवी के लिए एक अभियोजन शाखा का गठन किया जाएगा, जिसका नेतृत्व एक निदेशक करेगा।
केंद्र सरकार इस शाखा के लिए भी आवश्यक अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी।
अधिकार क्षेत्र
लोकसभा द्वारा 27 दिसंबर, 2011 को पारित विधेयक के अनुसार लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद तथा केंद्र सरकार के समूह ‘A’, ‘B’, ‘C’ और ‘D’ के अधिकारी और कर्मचारी आते हैं।
लोकपाल के अधिकार
तलाशी और जब्ती का अधिकार।
कुछ मामलों में दीवानी अदालत जैसी शक्तियाँ।
केंद्र या राज्य सरकार के अधिकारियों/कर्मचारियों की सेवाओं का उपयोग करने का अधिकार।
संपत्ति को अस्थायी रूप से जब्त (अटैच) करने का अधिकार।
जब्त की गई संपत्ति की पुष्टि (कन्फर्मेशन) करने का अधिकार।
विशेष परिस्थितियों में भ्रष्ट तरीकों से अर्जित संपत्ति, आय, प्राप्तियों या लाभों को जब्त करने का अधिकार।
भ्रष्टाचार के आरोपी सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण या निलंबन की सिफारिश करने का अधिकार।

Post a Comment