1857 की क्रांति: राजस्थान में क्रांति का विस्तृत इतिहास
1857 की क्रांति: राजस्थान में क्रांति का विस्तृत इतिहास
1857 की क्रांति भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। राजस्थान में भी इस क्रांति का प्रभाव विभिन्न रियासतों और सैनिक छावनियों में देखने को मिला। प्रस्तुत सामग्री में 1857 की क्रांति से संबंधित प्रमुख तथ्य, राजपूताना एजेंसी, सैनिक छावनियाँ तथा राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में हुए विद्रोह का विवरण दिया गया है।
1857 की क्रांति : महत्वपूर्ण तथ्य
क्रांति के समय गवर्नर जनरल कैनिंग था।
इंग्लैंड का प्रधानमंत्री पामरस्टोन था।
क्रांति के प्रतीक चिन्ह रोटी एवं कमल थे।
क्रांति की तारीख 31 मई रखी गई थी।
क्रांति की शुरुआत 10 मई, मेरठ से हुई।
क्रांति का मुख्य नेतृत्व बहादुरशाह जफर ने किया।
राजपूताना एजेंसी की स्थापना 1832 ई. में हुई।
राजपूताना एजेंसी का कार्यालय अजमेर में था।
इसका मुख्य अधिकारी A.G.G. (Agent to Governor General) था।
प्रथम A.G.G. लॉकट था।
1845 ई. में राजपूताना एजेंसी का ग्रीष्मकालीन कार्यालय आबू में स्थानांतरित कर दिया गया।
क्रांति के समय A.G.G. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस था।
क्रांति के समय P.A. एवं शासक
रियासत
P.A.
शासक
जयपुर
ईडन
रामसिंह II
कोटा
मेजर बर्टन
रामसिंह II
मेवाड़/उदयपुर
शावर्स
स्वरूपसिंह
मारवाड़/जोधपुर
मैक मोसन
तख्तासिंह
भरतपुर
मॉरिसन
जसवंत सिंह
सिरोही
जे. डी. हॉल
शिवसिंह
धौलपुर
—
भगवंत सिंह
बीकानेर
—
सरदार सिंह
करौली
—
मदनपालसिंह
टोंक
—
वजीरुदौला
बूंदी
—
रामसिंह
अलवर
—
विनयसिंह
प्रतापगढ़
—
दलपतसिंह
झालावाड़
—
पृथ्वीसिंह
जैसलमेर
—
रणजीत सिंह
क्रांति के समय राजस्थान की 6 प्रमुख छावनियाँ
1. नसीराबाद छावनी, अजमेर
यह राजस्थान की सबसे बड़ी छावनी थी।
2. एरिनपुरा, पाली
यहाँ जोधपुर लीजन के सैनिक थे।
3. नीमच, मध्य प्रदेश
यह राजस्थान से बाहर स्थित एकमात्र छावनी थी।
इसकी देखभाल मेवाड़ का P.A. करता था।
4. ब्यावर
यहाँ मेरे रेजीडेंस के सैनिक थे।
5. देवली, टोंक
यहाँ कोटा कॉन्टिनेंट के सैनिक थे।
6. खेरवाड़ा, उदयपुर
यहाँ मेवाड़ भील कोर के सैनिक थे।
खेरवाड़ा एवं ब्यावर छावनी में प्रत्यक्ष रूप से कोई विद्रोह नहीं हुआ।
1. नसीराबाद विद्रोह
28 मई, 1857 ई.
राजस्थान में क्रांति की शुरुआत नसीराबाद में हुई।
A.G.G. लॉरेंस को क्रांति की सूचना आबू में 19 मई को मिली।
अजमेर दुर्ग पर तैनात 15वीं बटालियन ने विद्रोह किया था।
इस बटालियन को नसीराबाद भेज दिया गया।
वहाँ 30वीं बटालियन भी इनके साथ मिल गई।
सैनिक बख्तावर सिंह ने अंग्रेज पिचार्ड से कहा:
“आप हमें अजमेर से नसीराबाद लाये हैं, क्या आपको हम पर भरोसा नहीं?”
सैनिकों ने न्यूबरी व स्पॉटिस नामक अंग्रेजों को मार दिया।
2. नीमच विद्रोह
3 जून, 1857 ई.
एबॉट नामक अधिकारी वफादारी की शपथ दिलवा रहा था।
मोहम्मद अली बेग ने कहा,
“हम क्यों वफादार रहें, क्या तुम वफादार रहे हो?”
मोहम्मद अली का इशारा अवध की तरफ था, जिसे अंग्रेजों ने कुशासन का आरोप लगाकर हड़प लिया था।
इसके बाद एबॉट को गोली मार दी गई।
यहाँ से 40 अंग्रेज परिवारों ने डूंगला गाँव (चित्तौड़गढ़) के खैराम के घर शरण ली।
यहाँ से स्वरूपसिंह ने जगमंदिर में शरण दी।
नीमच छावनी में अफवाह फैली कि आटे में हड्डियों का चूर्ण मिला है।
मेवाड़ के अर्जुनसिंह ने इस आटे की रोटी खाकर सैनिकों को संतुष्ट किया।
नीमच सैनिक देवली (टोंक) होते हुए निकले तो देवली सैनिक भी उनके साथ हो गए।
3. एरिनपुरा विद्रोह
21 अगस्त, 1857 ई.
एरिनपुरा के 90 सैनिक प्रशिक्षण के लिए आबू गए हुए थे।
लॉरेंस के पुत्र एलेक्जेंडर व होम्स की हत्या कर दी गई।
एरिनपुरा में सीतल प्रसाद, मोती खाँ, तिलकराम आदि के नेतृत्व में विद्रोह हुआ।
शिवसिंह के नेतृत्व में नारा दिया गया:
“चलो दिल्ली, मारो फिरंगी”
ठाकुर कुशालसिंह और 1857 की क्रांति
मारवाड़ क्षेत्र में ठाकुर कुशालसिंह ने क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुशालसिंह के सहयोगी
आसोप का ठाकुर शिवनाथ
गूलर का बिसनसिंह
आलनियावास का ठाकुर अजीतसिंह
लाम्बिया का ठाकुर पृथ्वीसिंह
बासवाना का ठाकुर चांदसिंह
विघोड़ा युद्ध, पाली
8 सितम्बर, 1857 ई.
कुशालसिंह विजयी हुआ।
यह युद्ध कुशालसिंह बनाम तख्तसिंह की सेना के बीच हुआ।
सेना के सेनापति ओनाड़ सिंह मारे गए।
कैप्टन हीथकोट व कुशलराज सिंह युद्ध से बचकर निकल गए।
चेलावास युद्ध / काला-गोरा युद्ध
18 सितम्बर, 1857 ई.
कुशालसिंह बनाम A.G.G. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस
P.A. मैक मोसन मारा गया।
कुशालसिंह के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य
जनवरी 1858 में गवर्नर होम्स व डीसा ने आबू को घेर लिया।
कुशालसिंह ने किले की जिम्मेदारी पृथ्वीसिंह को सौंपकर कोठारिया के जोधसिंह सलूम्बर के केसरी के यहाँ शरण ली।
नीमच में कुशालसिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया।
इसकी जाँच के लिए मेजर टेलर आयोग का गठन किया गया।
कुशालसिंह निर्दोष साबित हुआ।
1864 ई. में उदयपुर में कुशालसिंह की मृत्यु हुई।
कोटा जनविद्रोह
15 अक्टूबर, 1857 ई.
कोटा में कोई छावनी नहीं थी। यहाँ जनता ने ही विद्रोह किया।
लगभग 6 माह तक जनता का शासन रहा।
विद्रोह का नेतृत्व जयदयाल व मेहराब खाँ ने किया।
जयदयाल कामां (भरतपुर) का था।
P.A. बर्टन तथा उसके पुत्र डॉ. सैंडलर को मार दिया गया।
बर्टन का सिर काटकर पूरे शहर में घुमाया गया।
शासक रामसिंह को कैद कर लिया गया।
कोटा विद्रोह दबाने में करौली शासक मदनपाल ने अंग्रेजों की सहायता की।
मदनपाल को तोपों की सलामी 13 से बढ़ाकर 17 कर दी गई।
उसे G.C.I. की उपाधि दी गई।
रामसिंह की तोपों की सलामी 17 से घटाकर 13 कर दी गई।
जयदयाल एवं मेहराब खाँ को फाँसी दे दी गई।
जयपुर जनविद्रोह
नेतृत्व
उस्मान खाँ
सादुल खाँ
विलायत खाँ
रामसिंह ने अंग्रेजों की तन-मन-धन से सहायता की।
अंग्रेजों ने इन्हें सितार-ए-हिन्द की उपाधि तथा कोटपूतली की जागीर दी।
भरतपुर विद्रोह
31 मई, 1857 ई.
शासक जसवंत सिंह नाबालिग था।
शासन व्यवस्था मॉरिसन ने संभाल रखी थी।
यहाँ विद्रोह 31 मई को हुआ।
यहाँ मेव जाति ने विद्रोह किया।
मॉरिसन भागकर आगरा चला गया।
📚 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
1857 की क्रांति से संबंधित राजस्थान के प्रमुख स्थान:
नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा, कोटा, जयपुर, भरतपुर, चेलावास और विघोड़ा।
महत्वपूर्ण तिथियाँ:
10 मई 1857: मेरठ से क्रांति की शुरुआत
28 मई 1857: नसीराबाद विद्रोह
31 मई 1857: भरतपुर विद्रोह
3 जून 1857: नीमच विद्रोह
21 अगस्त 1857: एरिनपुरा विद्रोह
8 सितम्बर 1857: विघोड़ा युद्ध
18 सितम्बर 1857: चेलावास युद्ध
15 अक्टूबर 1857: कोटा जनविद्रोह
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