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शीत युद्ध के बाद विचारधारा का अन्त End of Ideology

 


शीत युद्ध के बाद विचारधारा का अन्त End of Ideology
विचारधारा का अन्त

(End of Ideology)

विचारधारा का अन्त

विचारधारा का अन्त : व्याख्या

1920 से 1960 तक का समय Age of Ideology माना जाता है, जब पूरे विश्व में समाजवादी, साम्यवादी, उदार-पूँजीवादी विचारधाराएँ अपने पूरे चरम पर थीं।

1960 में डैनियल बेल ने अपनी पुस्तक “End of Ideology” लिखी। इस पुस्तक से फिर पूरे विश्व में विचारधाराओं के अन्त का विवाद खड़ा हो गया।

अन्त समर्थक                           

डैनियल बेल – Book : The End of Ideology – 1960

जे. के. गैल्ब्रेथ – The New Industrial State – 1967

सी. राइट मिल्स – Political Man – 1960

राल्फ डेहरेंडोर्फ – Class and Class Conflicts in an Industrial Society – 1959

एन्थनी गिडेन्स – Beyond Left and Right : The Future of Radical Politics – 1994

अन्त विरोधी

रिचर्ड डॉकिन्स

C. Wright Mills

C. B. मैकफर्सन

समाजवादी चिन्तक

विचारधारा का अन्त : व्याख्या

1920 से 1960 तक का समय Age of Ideology माना जाता है, जब पूरे विश्व में समाजवादी, साम्यवादी, उदार-पूँजीवादी विचारधाराएँ अपने पूरे चरम पर थीं।

1960 में डैनियल बेल ने अपनी पुस्तक “End of Ideology” लिखी। इस पुस्तक से फिर पूरे विश्व में विचारधाराओं के अन्त का विवाद खड़ा हो गया।

डैनियल बेल

Book – End of Ideology (1960) – विचार का प्रतिपादन

बेल के अनुसार वर्तमान युग औद्योगिक नहीं बल्कि उत्तर-औद्योगिक समाज (Post Industrial Societies) का है।
वह समाज पूँजीवादी हो या समाजवादी, वहाँ उद्योगों के मुकाबले सेवा क्षेत्र का योगदान व कामगार बढ़ते जा रहे हैं।
वह युग सभी समाजों में तकनीकी विशेषज्ञ वर्ग यानी व्हाइट कॉलर जॉब का प्रमुख स्थापित हो रहा है।
इसी कारण विचारधाराओं का अन्त हो रहा है।

जे. के. गैल्ब्रेथ

The New Industrial State – 1967

गैल्ब्रेथ भी डैनियल बेल वाली बात दोहराते हैं।

सी. राइट मिल्स

Political Man – 1960

मिल्स के अनुसार धीरे-धीरे विचारधारा की स्पष्टता, उग्रता, भिन्नता का अन्त हो रहा है।
यानी शुद्धता का अन्त – जैसे उदार-पूँजीवाद शुद्ध नहीं रहा है, उसमें समाजवाद घुस गया है।

U.K. में – Labour + फैबियनवाद + लोक कल्याणकारी राज्य + बेवरीज रिपोर्ट (1943)
U.S.A. में – केन्सवाद, F.D. रूजवेल्ट की New Deal Policy

यही समाजवाद में उदारवाद की लहर चल रही है – उदाहरण : चीन।

विचारधाराओं के अन्त से सम्बन्धित ऐसे ही तर्क राल्फ डेहरेंडोर्फ ने अपनी पुस्तक
“Class and Class Conflict in Industrial Society” में दिये हैं।
अर्थात अब औद्योगिक देशों में वर्ग व वर्ग संघर्ष उतना तीव्र नहीं रहा है।

एन्थनी गिडेन्स

Beyond Left and Right : The Future of Radical Politics – 1994

गिडेन्स विचारधारा के अन्त को भूमण्डलीकरण (Globalization) के साथ जोड़ देते हैं।
यानी भूमण्डलीकरण, उदारीकरण व निजीकरण की लहर पूरे विश्व में छा गयी है।
सभी शासन प्रणालियाँ इन्हीं को Follow कर रही हैं।
अतः अब न Left (वामपंथी) है न Right (दक्षिणपंथी)।

उत्तर-आधुनिकतावाद

– माइकल फूको, देरिदा, ल्योतार

विचारधाराएँ आधुनिकीकरण के दौर की उपज थीं।
अब उत्तर-आधुनिकतावाद आ गया है। अतः इनकी कोई आवश्यकता नहीं है।

इस सारे विवाद में हमें दो राजनीतिक दार्शनिक और करने होंगे –
कार्ल पॉपर व हन्ना आरेंट – ये दोनों विचारधारा को
सर्वाधिकारवाद का पर्याय मानते हैं।

कार्ल पॉपर

Famous Book – Open Society and its Enemies – 1945
(खुला समाज व उसके दुश्मन)

कार्ल पॉपर तीन चिंतकों को खुले समाज का दुश्मन बताता है

1. प्लेटो

2. हीगल

3. कार्ल मार्क्स

पॉपर के अनुसार विचारधाराएँ केवल सर्वाधिकारवादी समाज (तानाशाही टाइप) में ही पायी जाती हैं क्योंकि
वहाँ सभी मनुष्यों को एक ही साँचे में ढालने की कोशिश की जाती है।

Open Society (मुक्त समाज) में विचारधारा का कोई स्थान नहीं होता
क्योंकि वहाँ आलोचना व बदलाव की स्वतंत्रता होती है।

कार्ल पॉपर का एक और प्रसिद्ध सिद्धान्त है –
“उत्तरार्द्ध परिवर्तन का सिद्धान्त” या “खण्डशः निर्माण” (Piece meal Engineering)।
यानि व्यवस्था में परिवर्तन जैसा कि मार्क्स ने कहा है कि क्रान्ति व Radical हो, सही नहीं है,
बल्कि धीरे-धीरे परिवर्तनों को आगे बढ़ाया जाए ताकि कहीं कमी रह जाए तो उसमें आसानी से सुधार किया जा सके।

हन्ना आरेंट

Book – The Origin of Totalitarianism – 1951

सर्वाधिकारवाद अपनी दो विशेषताओं के कारण समाज पर सम्पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करता है –

1. विचारधारा – मस्तिष्क पर नियंत्रण

2. आतंक (Terror) – शरीर पर नियंत्रण

विचारधारा के अन्त के विरोधी

1. रिचर्ड टिटमस –
जब तक समाज में एकाधिकारवादी व शोषणकारी पूँजीवाद, सामाजिक विघटन व सांस्कृतिक अपचयन रहेगी
तब तक विचारधाराएँ भी रहेंगी।

2. सी. राइट मिल्स –
विचारधारा के अन्त के समर्थक वास्तव में यथास्थिति (Status quo) के समर्थक हैं
क्योंकि इस विवाद से उनकी स्वार्थ सिद्धि होती है।

3. C. B. मैकफर्सन –
विचारधारा के अन्त के समर्थक बाजार समाज (पूँजीवाद) के भीतर ही
समानमूलक वितरण की समस्या का समाधान चाहते हैं,
जबकि बाजार समाज (उदार-पूँजीवाद) तो समानता की बजाय विषमता बढ़ाता है।

समाजवादी – विचारधारा के अन्त की बात केवल उदार-पूँजीवाद समर्थकों ने उठाई है। जब तक शोषण व असमानता रहेगी तब तक समाजवादी विचारधारा भी रहेगी।
समकालीन रूप
→ फुकुयामा
→ हंटिंगटन
1980 के दशक में पूर्वी यूरोप से साम्यवाद के अवसान व USSR के 1991 में विघटन के बाद ‘विचारधारा के अन्त’ की परिकल्पना ने एक नया रूप लिया है।
फ्रांसिस फुकुयामा (USA) ने एक नया शब्द गढ़ा है – The End of History।
फुकुयामा का लेख – ‘The End of History’ 1989 में USA की The National Interest मैगजीन में लिखा गया।
फुकुयामा की Book – “The End of History and Last Man” – 1992।
“उदारवाद की विजय ने इतिहास के उस लम्बे संघर्ष का अन्त कर दिया है जो इसके विकास से बाधक था।” – फुकुयामा।
अर्थात अब वर्तमान में उदार-पूँजीवाद, राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के रूप में खुद को स्थापित कर चुका है। फासीवाद व साम्यवादी विचारधारा हार चुकी है।
हंटिंगटन
ने 1993 में सुप्रसिद्ध लेख दिया – ‘A Clash of Civilization’ (सभ्यताओं का संघर्ष)।
भविष्य में संघर्ष आर्थिक या राजनीतिक विचारधाराओं के मध्य नहीं बल्कि ‘सांस्कृतिक विचारधाराओं’ के मध्य होगा। गैर-पश्चिमी सभ्यताएँ व संस्कृति – पश्चिमी संस्कृतियों को कड़ी टक्कर देंगी। इस संघर्ष में पारस्परिक समझौता भी सम्भव नहीं है।
हंटिंगटन ने पश्चिमी एशिया की मुस्लिम संस्कृति को ‘Fire of Rings’ (आग का गोला) कहा है।

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